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वन पर्व
अध्याय २९८
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वैशम्पाय़न उवाच
यद्यपि स्वेन रूपेण चरिष्यथ महीमिमाम् |  १७   क
न वो विज्ञास्यते कश्चित्त्रिषु लोकेषु भारत ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति