वन पर्व  अध्याय २९८

वैशम्पाय़न उवाच

न चाप्यधर्मे न सुहृद्विभेदने; परस्वहारे परदारमर्शने |  २८   क
कदर्यभावे न रमेन्मनः सदा; नृणां सदाख्यानमिदं विजानताम् ||  २८   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति