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द्रोण पर्व
अध्याय १३१
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सञ्जय़ उवाच
ततो माय़ाधरं द्रौणिर्घटोत्कचसुतं दिवि |  ५१   क
मार्गणैरभिविव्याध घनं सूर्य इवांशुभिः ||  ५१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति