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शान्ति पर्व
अध्याय २९९
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याज्ञवल्क्य उवाच
इन्द्रिय़ाणां हि सर्वेषामीश्वरं मन उच्यते |  १८   क
एतद्विशन्ति भूतानि सर्वाणीह महाय़शाः ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति