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वन पर्व
अध्याय २९९
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वैशम्पाय़न उवाच
इन्द्रेण निषधान्प्राप्य गिरिप्रस्थाश्रमे तदा |  ११   क
छन्नेनोष्य कृतं कर्म द्विषतां वलनिग्रहे ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति