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भीष्म पर्व
अध्याय ५८
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सञ्जय़ उवाच
वमन्तो रुधिरं चान्ये भिन्नकुम्भा महागजाः |  ५०   क
विह्वलन्तो गता भूमिं शैला इव धरातले ||  ५०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति