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वन पर्व
अध्याय २६७
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मार्कण्डेय़ उवाच
विस्तीर्णं चैव नः सैन्यं हन्याच्छिद्रेषु वै परः |  २९   क
प्लवोडुपप्रतारश्च नैवात्र मम रोचते ||  २९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति