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सभा पर्व
अध्याय १७
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कृष्ण उवाच
एवमुक्त्वा तु सा राजंस्तत्रैवान्तरधीय़त |  ४   क
स गृह्य च कुमारं तं प्राविशत्स्वगृहं नृपः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति