वन पर्व  अध्याय १५४

वैशम्पाय़न उवाच

एतामद्य परामृश्य स्त्रिय़ं राक्षस मानुषीम् |  १८   क
विषमेतत्समालोड्य कुम्भेन प्राशितं त्वय़ा ||  १८   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति