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द्रोण पर्व
अध्याय १०८
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सञ्जय़ उवाच
स तु तं विरथं कृत्वा स्मय़न्नत्यन्तवैरिणम् |  ४०   क
समाचिनोद्वाणगणैः शतघ्नीमिव शङ्कुभिः ||  ४०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति