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वन पर्व
अध्याय ८०
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पुलस्त्य उवाच
कार्त्तिक्यां तु विशेषेण योऽभिगच्छेत पुष्करम् |  ५२   क
फलं तत्राक्षय़ं तस्य वर्धते भरतर्षभ ||  ५२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति