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आदि पर्व
अध्याय ३
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सूत उवाच
नावनीतं हृदय़ं व्राह्मणस्य; वाचि क्षुरो निहितस्तीक्ष्णधारः |  १३२   क
विपरीतमेतदुभय़ं क्षत्रिय़स्य; वाङ्नावनीती हृदय़ं तीक्ष्णधारम् ||  १३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति