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आदि पर्व
अध्याय ३
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सूत उवाच
वज्रस्य भर्ता भुवनस्य गोप्ता; वृत्रस्य हन्ता नमुचेर्निहन्ता |  १५२   क
कृष्णे वसानो वसने महात्मा; सत्यानृते यो विविनक्ति लोके ||  १५२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति