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कर्ण पर्व
अध्याय २२
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सञ्जय़ उवाच
त्वय़ा पापानि घोराणि समाचीर्णानि पाण्डुषु |  २७   क
त्वत्कृते वर्तते घोरः पार्थिवानां जनक्षय़ः ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति