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वन पर्व
अध्याय २७०
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मार्कण्डेय़ उवाच
धन्योऽसि यस्य ते निद्रा कुम्भकर्णेय़मीदृशी |  २२   क
य इमं दारुणं कालं न जानीषे महाभय़म् ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति