आदि पर्व  अध्याय ३

सूत उवाच

अश्वश्चातिप्रमाणय़ुक्तः |  १७०   क
स चापि कः ||  १७०   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति