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आदि पर्व
अध्याय ३
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सूत उवाच
आसां प्रजानां परिपालनेन; स्वं क्षत्रधर्मं परिपालय़ामि |  १८३   क
प्रव्रूहि वा किं क्रिय़तां द्विजेन्द्र; शुश्रूषुरस्म्यद्य वचस्त्वदीय़म् ||  १८३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति