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वन पर्व
अध्याय २१२
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मार्कण्डेय़ उवाच
आस्यात्सुगन्धि तेजश्च अस्थिभ्यो देवदारु च |  १३   क
श्लेष्मणः स्फटिकं तस्य पित्तान्मरकतं तथा ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति