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वन पर्व
अध्याय १७३
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वैशम्पाय़न उवाच
अवाप्य वासं नरदेवपुत्राः; प्रसादजं वैश्रवणस्य राज्ञः |  ४   क
न प्राणिनां ते स्पृहय़न्ति राज; ञ्शिवश्च कालः स वभूव तेषाम् ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति