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द्रोण पर्व
अध्याय ५०
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सञ्जय़ उवाच
छत्रच्छाय़ासमुचितं तस्य तद्वदनं शुभम् |  ४०   क
नूनमद्य रजोध्वस्तं रणे रेणुः करिष्यति ||  ४०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति