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द्रोण पर्व
अध्याय ७०
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सञ्जय़ उवाच
तेऽपि सर्वप्रय़त्नेन द्रोणमेव समाद्रवन् |  १२   क
विभित्सन्तो महासेतुं वार्योघाः प्रवला इव ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति