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आदि पर्व
अध्याय ३
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सूत उवाच
स शिष्यान्न किञ्चिदुवाच |  ८४   क
कर्म वा क्रिय़तां गुरुशुश्रूषा वेति |  ८४   ख
दुःखाभिज्ञो हि गुरुकुलवासस्य शिष्यान्परिक्लेशेन योजय़ितुं नेय़ेष ||  ८४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति