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शल्य पर्व
अध्याय ६३
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सञ्जय़ उवाच
आज्ञप्तं नृपमुख्येषु मानः प्राप्तः सुदुर्लभः |  २२   क
आजानेय़ैस्तथा यातं को नु स्वन्ततरो मय़ा ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति