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आदि पर्व
अध्याय ३
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सूत उवाच
स जनमेजय़ एवमुक्तो देवशुन्या सरमय़ा दृढं सम्भ्रान्तो विषण्णश्चासीत् |  ९   क
देवान्वाग्भिः पितृनद्भिस्तर्पय़ित्वाजगाम ह ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति