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सौप्तिक पर्व
अध्याय ३
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सञ्जय़ उवाच
व्यसनं वा पुनर्घोरं समृद्धिं वापि तादृशीम् |  १२   क
अवाप्य पुरुषो भोज कुरुते वुद्धिवैकृतम् ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति