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सौप्तिक पर्व
अध्याय ३
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सञ्जय़ उवाच
सर्वे हि युक्तिं विज्ञाय़ प्रज्ञां चापि स्वकां नराः |  १६   क
चेष्टन्ते विविधाश्चेष्टा हितमित्येव जानते ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति