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सौप्तिक पर्व
अध्याय ३
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सञ्जय़ उवाच
क्षत्रधर्मं विदित्वाहं यदि व्राह्मण्यसंश्रितम् |  २२   क
प्रकुर्यां सुमहत्कर्म न मे तत्साधु संमतम् ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति