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सौप्तिक पर्व
अध्याय ३
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सञ्जय़ उवाच
धारय़ित्वा धनुर्दिव्यं दिव्यान्यस्त्राणि चाहवे |  २३   क
पितरं निहतं दृष्ट्वा किं नु वक्ष्यामि संसदि ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति