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सौप्तिक पर्व
अध्याय ३
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सञ्जय़ उवाच
सोऽहमद्य यथाकामं क्षत्रधर्ममुपास्य तम् |  २४   क
गन्तास्मि पदवीं राज्ञः पितुश्चापि महाद्युतेः ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति