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सौप्तिक पर्व
अध्याय ३
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सञ्जय़ उवाच
अद्य स्वप्स्यन्ति पाञ्चाला विश्वस्ता जितकाशिनः |  २५   क
विमुक्तय़ुग्यकवचा हर्षेण च समन्विताः |  २५   ख
वय़ं जिता मताश्चैषां श्रान्ता व्याय़मनेन च ||  २५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति