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सौप्तिक पर्व
अध्याय ३
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सञ्जय़ उवाच
अद्य तान्सहितान्सर्वान्धृष्टद्युम्नपुरोगमान् |  २८   क
सूदय़िष्यामि विक्रम्य कक्षं दीप्त इवानलः |  २८   ख
निहत्य चैव पाञ्चालाञ्शान्तिं लव्धास्मि सत्तम ||  २८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति