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सौप्तिक पर्व
अध्याय ३
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सञ्जय़ उवाच
अद्याहं सर्वपाञ्चालैः कृत्वा भूमिं शरीरिणीम् |  ३१   क
प्रहृत्यैकैकशस्तेभ्यो भविष्याम्यनृणः पितुः ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति