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सौप्तिक पर्व
अध्याय ३
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सञ्जय़ उवाच
अद्य पाञ्चालसेनां तां निहत्य निशि सौप्तिके |  ३५   क
कृतकृत्यः सुखी चैव भविष्यामि महामते ||  ३५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति