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स्त्री पर्व
अध्याय ३
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विदुर उवाच
गृहाण्येव हि मर्त्यानामाहुर्देहानि पण्डिताः |  ५   क
कालेन विनिय़ुज्यन्ते सत्त्वमेकं तु शोभनम् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति