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शान्ति पर्व
अध्याय ३
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नारद उवाच
यदा तु रुधिरेणाङ्गे परिस्पृष्टो भृगूद्वहः |  १०   क
तदावुध्यत तेजस्वी सन्तप्तश्चेदमव्रवीत् ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति