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शान्ति पर्व
अध्याय ३
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नारद उवाच
स दृष्टमात्रो रामेण कृमिः प्राणानवासृजत् |  १४   क
तस्मिन्नेवासृक्सङ्क्लिन्ने तदद्भुतमिवाभवत् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति