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वन पर्व
अध्याय ८१
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पुलस्त्य उवाच
अहो महर्षे धर्मज्ञ किमर्थं नृत्यते भवान् |  १०३   क
हर्षस्थानं किमर्थं वा तवाद्य मुनिपुङ्गव ||  १०३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति