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वन पर्व
अध्याय १३
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वैशम्पाय़न उवाच
पाञ्चालस्य च दाय़ादा धृष्टकेतुश्च चेदिपः |  २   क
केकय़ाश्च महावीर्या भ्रातरो लोकविश्रुताः ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति