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वन पर्व
अध्याय ७८
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वृहदश्व उवाच
ईजे च विविधैर्यज्ञैर्विधिवत्स्वाप्तदक्षिणैः |  ५   क
तथा त्वमपि राजेन्द्र ससुहृद्वक्ष्यसेऽचिरात् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति