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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३
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वैशम्पाय़न उवाच
विद्यते द्रविणं पार्थ गिरौ हिमवति स्थितम् |  २०   क
उत्सृष्टं व्राह्मणैर्यज्ञे मरुत्तस्य महीपतेः |  २०   ख
तदानय़स्व कौन्तेय़ पर्याप्तं तद्भविष्यति ||  २०   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति