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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३
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वैशम्पाय़न उवाच
यच्च किञ्चित्पुरा पापं धृतराष्ट्रसुतैः कृतम् |  १२   क
अकृत्वा हृदि तद्राजा तं नृपं सोऽन्ववर्तत ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति