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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३
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वैशम्पाय़न उवाच
यश्च कश्चिन्नरः किञ्चिदप्रिय़ं चाम्विकासुते |  १३   क
कुरुते द्वेष्यतामेति स कौन्तेय़स्य धीमतः ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति