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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३
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वैशम्पाय़न उवाच
अन्ववर्तत भीमोऽपि निष्टनन्धर्मजं नृपम् |  १६   क
धृतराष्ट्रं च सम्प्रेक्ष्य सदा भवति दुर्मनाः ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति