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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३
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वैशम्पाय़न उवाच
राजानमनुवर्तन्तं धर्मपुत्रं महामतिम् |  १७   क
अन्ववर्तत कौरव्यो हृदय़ेन पराङ्मुखः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति