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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३
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वैशम्पाय़न उवाच
वर्तमानेषु सद्वृत्तिं पाण्डवेषु महात्मसु |  २   क
प्रीतिमानभवद्राजा धृतराष्ट्रोऽम्विकासुतः ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति