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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३
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वैशम्पाय़न उवाच
सौवलेय़ी च गान्धारी पुत्रशोकमपास्य तम् |  ३   क
सदैव प्रीतिमत्यासीत्तनय़ेषु निजेष्विव ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति