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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३
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वैशम्पाय़न उवाच
यद्यद्व्रूते च किञ्चित्स धृतराष्ट्रो नराधिपः |  ५   क
गुरु वा लघु वा कार्यं गान्धारी च यशस्विनी ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति