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मौसल पर्व
अध्याय ३
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वैशम्पाय़न उवाच
एवं पश्यन्हृषीकेशः सम्प्राप्तं कालपर्ययम् |  १६   क
त्रय़ोदश्याममावास्यां तां दृष्ट्वा प्राव्रवीदिदम् ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति