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मौसल पर्व
अध्याय ३
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वैशम्पाय़न उवाच
विमृशन्नेव कालं तं परिचिन्त्य जनार्दनः |  १८   क
मेने प्राप्तं स षट्त्रिंशं वर्षं वै केशिसूदनः ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति