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महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय ३
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इन्द्र उवाच
स्वर्गे लोके श्ववतां नास्ति धिष्ण्य; मिष्टापूर्तं क्रोधवशा हरन्ति |  १०   क
ततो विचार्य क्रिय़तां धर्मराज; त्यज श्वानं नात्र नृशंसमस्ति ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति