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महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय ३
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इन्द्र उवाच
शुना दृष्टं क्रोधवशा हरन्ति; यद्दत्तमिष्टं विवृतमथो हुतं च |  १२   क
तस्माच्छुनस्त्यागमिमं कुरुष्व; शुनस्त्यागात्प्राप्स्यसे देवलोकम् ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति